दक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्य के तिरुचिरापल्ली जिले में, कावेरी नदी के दो धाराओं से घिरे एक विशाल द्वीप पर, विराजमान हैं भगवान विष्णु के शयन अवस्था के सबसे भव्य स्वरूप – श्री रंगनाथस्वामी मंदिर श्रीरंगम। यह मंदिर न केवल 108 दिव्य देसमों में प्रथम माना जाता है, बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा कार्यशील हिंदू मंदिर परिसर भी है। लगभग 156 एकड़ में फैले इस धार्मिक स्थल का गौरव केवल इसके विस्तार में नहीं, बल्कि इसकी अद्भुत द्रविड़ वास्तुकला, समृद्ध पौराणिक इतिहास और सदियों से चली आ रही अटूट पूजा-परंपरा में निहित है। यह एक जीवंत सांस्कृतिक विरासत है जो भक्ति और कला का अनूठा संगम प्रस्तुत करती है।
श्री रंगनाथस्वामी मंदिर श्रीरंगम – पौराणिक महत्व और कथाएँ
श्री रंगनाथस्वामी मंदिर श्रीरंगम की स्थापना का सम्बन्ध सीधे भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी से जोड़ा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, श्री रंगनाथस्वामी की यह प्रतिमा मूल रूप से भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी को प्रदान की थी। ब्रह्मा जी ने इसे इक्ष्वाकु वंश के प्रतापी राजा इक्ष्वाकु को सौंपा, जिन्होंने इसे अयोध्या में स्थापित किया। बाद में, श्री राम ने विभीषण को यह प्रतिमा लंका की यात्रा के दौरान दान में दी। लेकिन, विभीषण के लंका पहुँचने से पहले, जिस स्थान पर इस मूर्ति को भूमि पर रखा गया, वहीं यह स्थिर हो गई। यही स्थान श्रीरंगम कहलाया।
“यह वह पवित्र स्थान है जहाँ स्वयं भगवान विष्णु ने श्री राम के अनुरोध पर, विभीषण के लिए विश्वास का प्रतीक बनने हेतु, सदैव के लिए निवास करने का वरदान दिया।”
एक अन्य मान्यता यह है कि यह स्थान आदि सेश के मुकुट पर स्थित है और कावेरी नदी के बीच बना होने के कारण यह ‘अंतरंग विमान’ (भीतरी निवास) कहलाता है, जो स्वर्ग और पृथ्वी के बीच एक सेतु है। मंदिर परिसर में स्थित शंकन मलाई नामक टीले को वह स्थान माना जाता है, जहाँ विभीषण ने प्रतिदिन इस मूर्ति की पूजा की थी।
श्री रंगनाथस्वामी मंदिर श्रीरंगम का इतिहास
श्री रंगनाथस्वामी मंदिर श्रीरंगम का इतिहास लगभग दो सहस्राब्दी पुराना है। इसके विकास में कई राजवंशों का योगदान रहा:
- प्रारम्भिक योगदान (3री-9वीं शताब्दी): माना जाता है कि मंदिर का मूल ढांचा संगम युग (300 ईसा पूर्व से 300 ईस्वी) के दौरान बना। पल्लव, चोल और पांड्य शासकों ने इसके प्रारंभिक गर्भगृह और मंडपों का निर्माण करवाया।
- चोलों का स्वर्णिम युग (9वीं-13वीं शताब्दी): चोल वंश, विशेषकर राजराजा चोल और राजेन्द्र चोल प्रथम, ने मंदिर को भव्य रूप दिया। उन्होंने राजगोपुरम (मुख्य गोपुरम) सहित कई संरचनाओं का निर्माण करवाया।
- होयसल और विजयनगर साम्राज्य (14वीं-16वीं शताब्दी): होयसल शासकों ने मंडपों का विस्तार किया। विजयनगर साम्राज्य, खासकर कृष्णदेवराय के समय मंदिर की समृद्धि चरम पर पहुँची। उन्होंने चंद्र पुष्करणी तालाब के चारों ओर की दीवार और कई मंडप बनवाए।
- आधुनिक काल: 17वीं शताब्दी में मुगल आक्रमणकारी मलिक काफूर ने मंदिर को क्षति पहुँचाई, लेकिन बाद में मदुरै के नायक शासकों ने इसका जीर्णोद्धार करवाया। स्वतंत्रता के बाद से, श्रीरंगम मंदिर ट्रस्ट इसके प्रबंधन और संरक्षण का कार्य देख रहा है।
श्री रंगनाथस्वामी मंदिर श्रीरंगम के अनसुने तथ्य

- सात परिक्रमा पथ: मंदिर परिसर में सात कन्क्रिट दीवारें (प्राकार) हैं, जो सात चक्रों का प्रतीक हैं। इन दीवारों की कुल लम्बाई 10 किलोमीटर से अधिक है और इनमें 21 विशाल गोपुरम हैं।
- विभीषण की दैनिक पूजा का स्थान: मान्यता है कि लंका के राजा और भगवान राम के भक्त विभीषण आज भी रोजाना रात्रि में इस मंदिर में आकर भगवान रंगनाथ की पूजा करते हैं। मंदिर परिसर के अंदर “शंकन मलाई” नामक एक छोटी पहाड़ी है, जहाँ उनके आगमन के लिए एक विशेष दीपक हमेशा जलता रहता है और एक छोटा सा मंदिर बना हुआ है।
- अधूरा राजगोपुरम: मुख्य दक्षिणी गोपुरम (राजगोपुरम) 11 मंजिला और 236 फीट ऊँचा है, लेकिन यह अधूरा है। 17वीं शताब्दी में इसका निर्माण रुक गया और आज भी यह अपनी पूर्ण ऊँचाई तक नहीं पहुँचा है। यदि पूरा होता, तो यह दुनिया का सबसे ऊँचा मंदिर गोपुरम होता।
- गुप्त सुरंगें: मान्यता है कि मंदिर के गर्भगृह से तीसरी दीवार (चौथी प्राकार) के भीतर एक गुप्त सुरंग है, जो तिरुवनैकवल (जम्बुकेश्वर मंदिर) तक जाती है, जो लगभग 5 किमी दूर है।
- हजार स्तंभों का मंडप: प्रसिद्ध हजार स्तंभों का मंडप वास्तव में केवल 953 खम्भों से बना है! यह एक अद्भुत ध्वनि और प्रकाश अभियांत्रिकी का नमूना है, जहाँ मंडप के केंद्र में खड़े होकर ताली बजाने पर संगीतमय प्रतिध्वनि सुनाई देती है।
- अलग-अलग वाहन: भगवान रंगनाथ की प्रतिमा शयन अवस्था में है, लेकिन उत्सव मूर्ति (उत्सवर) को विभिन्न दिनों में अलग-अलग वाहनों पर बैठाकर शोभायात्रा निकाली जाती है, जैसे हंस, घोड़ा, हाथी आदि।
- स्वर्ण कलश का रहस्य: मंदिर के विमान (गर्भगृह के ऊपरी शिखर) पर स्थित स्वर्ण कलश को एक ही पत्थर से तराशकर बनाया गया है और उसे 3,000 किलो से अधिक सोने से मढ़ा गया है।
- शिलालेखों का भंडार: मंदिर की दीवारों पर 800 से अधिक शिलालेख हैं, जो तमिल, संस्कृत, कन्नड़, तेलुगु और मराठी भाषाओं में हैं। ये दान, निर्माण और ऐतिहासिक घटनाओं का विस्तृत ब्यौरा देते हैं।
वास्तुकला का विस्तृत विश्लेषण
श्री रंगनाथस्वामी मंदिर श्रीरंगम द्रविड़ शैली का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसका लेआउट अणुशासन पद्धति (अग्नि पुराण में वर्णित वास्तु सिद्धांत) पर आधारित है।
- लक्ष्य: मंदिर का मुख्य अक्ष पूर्व-पश्चिम दिशा में है, जिसमें मुख्य प्रवेश द्वार दक्षिण में है। यह अनूठी व्यवस्था है।
- गर्भगृह (सन्निधि): गर्भगृह में भगवान रंगनाथ की विशाल शयनमुद्रा में प्रतिमा है, जिसके सिरहाने देवी लक्ष्मी विराजमान हैं। यह प्रतिमा शालिग्राम पत्थर से बनी हुई है।
- गोपुरम: 21 गोपुरमों में सबसे ऊँचा दक्षिणी राजगोपुरम (236 फीट) है। इन गोपुरमों पर हजारों रंगीन प्लास्टर से बनी देवी-देवताओं, पौराणिक प्रसंगों और योद्धाओं की मूर्तियाँ हैं, जो एक चलता-फिरता पौराणिक विश्वकोष प्रस्तुत करती हैं।
- मंडप: सेस गोपुरम मंडप, 1000 स्तंभों का मंडप, गरुड़ मंडप आदि अपनी नक्काशी और स्तंभ शिल्प के लिए प्रसिद्ध हैं। रंगनाथन स्वामी की पालकी को रखने वाला मंडप विशेष है।
- सामग्री: मुख्य रूप से ग्रेनाइट पत्थर का उपयोग किया गया है, जो पास के पर्वतों से लाया गया था। प्लास्टर की मूर्तियों के लिए चूना, गुड़, क्वार्टज और अन्य प्राकृतिक सामग्री का प्रयोग हुआ है।
- तुलनात्मक विश्लेषण: यह मंदिर तमिलनाडु के दो अन्य ‘रंग’ मंदिरों – श्रीरंगम (कोइल), श्रीरंगपट्टनम (बंगी), और अंबेरंगम (बुज्जि) में सबसे बड़ा और प्रमुख है। यह तिरुपति बालाजी मंदिर से भी क्षेत्रफल में बड़ा है।
श्री रंगनाथस्वामी मंदिर श्रीरंगम के धार्मिक अनुष्ठान और उत्सव
मंदिर में पूजा-अनुष्ठान पंचरात्र आगम के नियमों के अनुसार होती है।
- दैनिक पूजा: प्रतिदिन छः बार की पूजा (उषाकालम, कलाशंति, उच्चिकालम, सयरक्षै, इरैंडम कालम, अर्ध जाम) होती है। प्रत्येक पूजा में भगवान को अलग-अलग वस्त्र और आभूषण पहनाए जाते हैं।
- विशेष आरती: वैकुण्ठ एकादशी (दिसंबर-जनवरी) के दौरान होने वाली परिवेश उत्सवम सबसे महत्वपूर्ण है, जहाँ लाखों श्रद्धालु स्वर्ग के द्वार (वैकुण्ठ द्वारम) के खुलने की प्रतीक्षा करते हैं।
- प्रमुख त्यौहार: पंगुनी उत्तिरम (मार्च-अप्रैल), वसंतोत्सवम् (वसंत), अवनी अविट्टम (जन्माष्टमी के समय), और अद्ययन उत्सवम (21 दिनों का महोत्सव) बड़े धूमधाम से मनाए जाते हैं।
- विशेष प्रसाद: मंदिर का खीर (अक्कारा अदिशिल) अत्यंत प्रसिद्ध है। भगवान को चढ़ाया जाने वाला मक्खन (वेन्नई) भी श्रद्धालुओं में बहुत लोकप्रिय है।
श्री रंगनाथस्वामी मंदिर श्रीरंगम – यात्रा गाइड और सुविधाएँ
- पहुँच मार्ग:
- हवाई मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा तिरुचिरापल्ली (TRZ), लगभग 15 किमी दूर।
- रेल मार्ग: श्रीरंगम रेलवे स्टेशन (मंदिर से 2 किमी) या तिरुचिरापल्ली जंक्शन (मंदिर से 10 किमी)।
- सड़क मार्ग: तिरुचिरापल्ली से बस या ऑटो/टैक्सी द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है।
- स्थानीय परिवहन: ऑटो-रिक्शा और टैक्सी आसानी से उपलब्ध। मंदिर के बाहर से शहर के लिए बसें भी चलती हैं।
- सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च तक का समय मौसम के हिसाब से सबसे अच्छा है। त्योहारों के समय भीड़ अधिक रहती है।
- दर्शन समय: सुबह 6:00 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक और शाम 4:00 बजे से रात 9:00 बजे तक। विशेष पूजाओं के समय में बदलाव हो सकता है।
- आवास: मंदिर ट्रस्ट द्वारा संचालित चैत्र (बजट) और अन्य अच्छे होटल उपलब्ध हैं। तिरुचिरापल्ली में भी कई होटल हैं।
- सुविधाएँ: विशाल पार्किंग, क्लोक रूम, मुफ्त जूता रखने की व्यवस्था, अच्छी तरह से संचालित प्रसाद काउंटर। लाइसेंसशुदा गाइड उपलब्ध हैं।
- फोटोग्राफी: मुख्य गर्भगृह के अंदर फोटोग्राफी वर्जित है। बाहरी परिसर, गोपुरम और मंडपों की फोटोग्राफी की जा सकती है।
पर्यटकों के लिए विशेष सुझाव
- पोशाक: पारंपरिक या सादे, शालीन कपड़े पहनें। पैंट/जींस और शर्ट की अनुमति है, लेकिन शॉर्ट्स से बचें।
- देखें: मंदिर का पूरा चक्कर लगाने (7 प्राकार) में कम से कम 3-4 घंटे का समय दें। हजार स्तंभ मंडप, गरुड़ मंडप और चंद्र पुष्करणी तालाब अवश्य देखें।
- आस-पास के आकर्षण: तिरुचिरापल्ली रॉकफोर्ट मंदिर और जम्बुकेश्वर मंदिर (तिरुवनैकवल) एक ही दिन में देखे जा सकते हैं।
- सावधानी: भीड़ में अपने सामान का ध्यान रखें। मंदिर के नियमों और पुजारियों के निर्देशों का पालन करें।
श्री रंगनाथस्वामी मंदिर श्रीरंगम के वैज्ञानिक और प्राकृतिक आश्चर्य
श्री रंगनाथस्वामी मंदिर श्रीरंगम परिसर के बीचों-बीच स्थित चंद्र पुष्करणी तालाब न केवल धार्मिक दृष्टि से पवित्र है, बल्कि इसका जल स्तर सदैव नियंत्रित रहता है। माना जाता है कि इसका जल अमृत के समान है। मंदिर के विशाल गोपुरम और पत्थरों के निर्माण में प्राचीन साउंड एंड लाइट इंजीनियरिंग का उपयोग किया गया है, जो गर्भगृह में एक विशेष प्रकार की शांति और ऊर्जा का संचार करता है। परिसर में कई पुराने और विशालकाय वृक्ष हैं, जो इसे एक प्राकृतिक ऑक्सीजन जोन बनाते हैं।
सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव
श्री रंगनाथस्वामी मंदिर श्रीरंगम न केवल एक धार्मिक केंद्र है, बल्कि तिरुचिरापल्ली शहर की आर्थिक रीढ़ भी है। यह हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार प्रदान करता है। मंदिर ट्रस्ट शिक्षा (स्कूल, कॉलेज) और चिकित्सा सेवाओं का भी संचालन करता है। यहाँ संगीत, नृत्य और शास्त्रीय चर्चा के नियमित आयोजन होते हैं, जिससे भारतीय संस्कृति का संरक्षण और प्रसार होता है। भक्ति आंदोलन के प्रमुख संतों जैसे रामानुजाचार्य का इस मंदिर से गहरा नाता रहा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
- प्रसिद्ध वैकुण्ठ एकादशी पर क्या खास होता है?
- इस दिन माना जाता है कि मंदिर का वैकुण्ठ द्वार (उत्तरी गोपुरम में एक विशेष दरवाजा) खुलता है और इससे गुजरने वालों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- श्री रंगनाथस्वामी मंदिर श्रीरंगम में दर्शन के लिए कितना समय लगता है?
- सामान्य दर्शन में 1-2 घंटे, लेकिन पूरे परिसर का भ्रमण करने में 4-5 घंटे लग सकते हैं।
- विशेष पूजा या आरती बुक कर सकते हैं क्या?
- हाँ, श्री रंगनाथस्वामी मंदिर श्रीरंगम कार्यालय में संपर्क करके विशेष पूजा और आरती बुक की जा सकती है।
- श्री रंगनाथस्वामी मंदिर श्रीरंगम के आसपास कहाँ ठहरें?
- मंदिर ट्रस्ट के गेस्ट हाउस (चैत्र) या तिरुचिरापल्ली शहर में कई बजट और लक्जरी होटल उपलब्ध हैं।
- क्या श्री रंगनाथस्वामी मंदिर श्रीरंगम में प्रवेश शुल्क है?
- नहीं, सामान्य दर्शन के लिए कोई शुल्क नहीं है। विशेष दर्शन या पूजा के लिए शुल्क है।
- श्री रंगनाथस्वामी मंदिर श्रीरंगम किस दिन बंद रहता है?
- मंदिर साल के 365 दिन खुला रहता है।
- श्री रंगनाथस्वामी मंदिर श्रीरंगम में क्या प्रसाद मिलता है?
- खीर (अक्कारा अदिशिल), लड्डू, और मक्खन प्रसिद्ध प्रसाद हैं।
- क्या मंदिर में गैर-हिंदू प्रवेश कर सकते हैं?
- हाँ, सभी धर्मों के लोग मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं, लेकिन मुख्य गर्भगृह में केवल हिंदुओं को प्रवेश की अनुमति है।
निष्कर्ष
श्री रंगनाथस्वामी मंदिर, श्रीरंगम केवल पत्थरों का ढाँचा नहीं, बल्कि भक्ति, इतिहास, कला और वास्तुशिल्प का एक जीवित विश्वकोष है। यहाँ आने वाला हर भक्त और पर्यटक इसकी विशालता में खो जाता है और आध्यात्मिक शांति का अनुभव करता है। devsthanam.com के माध्यम से हमने इस अद्भुत धरोहर की संपूर्ण जानकारी देने का प्रयास किया है। आप भी इस पावन धाम के दर्शन कर अपनी आत्मा को धन्य करें।
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